Saturday, June 26, 2010

आंख खुलने में 26 साल?

        राजदीप सरदेसाई

दिसंबर 1984 में आप कहां थे? यही वह सवाल है, जो पिछले एक पखवाड़े में पूरे मीडिया ने भोपाल गैस त्रासदी पर निचली अदालत का फैसला आने के बाद बिना चूके लगातार पूरी तत्परता के साथ उठाया। अस्सी साल के वयोवृद्ध राजनीतिज्ञों, कूटनीतिज्ञों और नौकरशाहों सबको खोज-खोजकर एक ही बात जानने की कोशिश की गई: भारत की सबसे भयंकरतम औद्योगिक त्रासदी के बाद एक हफ्ते के भीतर किसने यूनियन कार्बाइड के चेयरमैन वॉरेन एंडरसन को भारत से बाहर जाने दिया?
इस सवाल का जवाब देने के लिए किसी विशेष खोजबीन या चीखते शीर्षकों की जरूरत नहीं है। सच्चई यह है कि इस बात के पर्याप्त लिखित और दृश्य प्रमाण व दस्तावेज मौजूद हैं, जो इस बात की पुष्टि करते हैं कि ‘भारत की राजव्यवस्था’ ने एंडरसन को जाने का ‘सुरक्षित रास्ता’ मुहैया कराया। ‘सरकार’ में भोपाल में अजरुन सिंह के नेतृत्व वाली कांग्रेस और केंद्र में राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार दोनों ही शामिल थे
दुर्भाग्य से इस बुनियादी और सीधी सी सच्चई को स्वीकार करने के बजाय हमने प्रतिदिन खंडन-मंडन, अंतर्विरोधों और खुलासों की प्रदर्शनी लगा रखी है। यह सब कितना हास्यास्पद है, क्योंकि एक दुखद त्रासदी में १५,क्क्क् से ज्यादा लोग मारे गए और उनके प्रति कोई गंभीर सहानुभूति व चिंता नहीं है। एक ओर जहां अजरुन सिंह ने बुद्ध की तरह मौन धारण कर लिया, वहीं दूसरी ओर कांग्रेस अपने प्रिय नेता राजीव गांधी का बचाव करने के लिए समस्त हदें लांघ चुकी है। यहां तक कि विपक्ष भी भोपाल मामले में आपातकाल जैसा व्यवहार कर रहा है।
साफगोई और ईमानदारी की बात यह है कि इस मामले में न तो मौन उचित है और न ही प्रमादपूर्ण आलाप। अजरुन सिंह का यह कहना बहुत हास्यास्पद है कि भोपाल मामले में कोई निर्णायक कदम उठाने का उनके पास अधिकार नहीं था। वे उस समय मध्य प्रदेश के सबसे ऊंचे पद पर विराजमान नेता थे। एंडरसन राज्य सरकार के विमान से ही यहां से उड़ गया और धारा 304 के तहत उस पर जो आरोप लगे थे, सत्र न्यायालय में राज्य पुलिस द्वारा ही इस धारा को रफा-दफा कर दिया गया। निश्चित तौर पर इस देश को यह जानने का अधिकार है कि क्यों और किसके निर्देश पर श्री सिंह ने यह निर्णय लिया था।
लेकिन एंडरसन के बच निकलने के मामले में राजीव गांधी का भी हाथ होने का जो आरोप है, उस पर कांग्रेस और विपक्ष के भीतर जो उन्मादपूर्ण स्थिति है, उसका क्या? कांग्रेस, जो वंशवाद की परंपरा से नाभिनाल बद्ध है, राजीव गांधी का नाम भर लेना ही उसे गुस्सा दिलाने के लिए काफी है। उसकी प्रतिक्रिया होगी, ‘इस पूरे मामले में राजीव गांधी का नाम घसीटने की तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई?’ विपक्ष, जो पीढ़ियों से नेहरू-गांधी परिवार के लिए घृणा के बलबूते ही फला-फूला है, उसके लिए यह हिंदुस्तान की राजनीति के प्रथम परिवार को कठघरे में खड़ा करने का एक अवसर है।
विडंबना यह है कि एंडरसन को हिंदुस्तान से बाहर का सुरक्षित रास्ता दिखाने में कुछ भी शर्मनाक नहीं है। अगर यह निर्णय राजीव गांधी द्वारा लिया गया था - और इस बात पर यकीन करना नामुमकिन है कि प्रधानमंत्री इस पूरे मामले से बिल्कुल अनभिज्ञ थे - तो यह निर्णय उनके द्वारा लिए गए बुद्धिमत्तापूर्ण निर्णयों में से एक था। आप राजीव गांधी पर बाबरी मस्जिद के दरवाजे खुलवाने का आरोप लगा सकते हैं, 1987 में कश्मीर घाटी में आम चुनावों में कुछ छेड़छाड़ का भी आरोप लगा सकते हैं, लिट्टे समस्या पर उनके रुख को लेकर दोष मढ़ सकते हैं। ये सभी वे मुद्दे हैं, जिनके बहुत भयानक नतीजे सामने आए। आप ये सभी आरोप लगा सकते हैं, लेकिन एंडरसन के मामले में संभवत: उन्होंने सबसे सही रास्ता चुना था। दिसंबर 1984 जून 2010 नहीं है। उस समय कुछ ही हफ्तों पहले इंदिरा गांधी की हत्या हुई थी, सिख आतंकवाद राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जबर्दस्त चुनौती बना हुआ था, देश की राजधानी खूनी नरसंहार से क्षत-विक्षत हो गई थी, दक्षिण-पूर्व धीमी आंच पर खदबदा रहा था, अर्थव्यवस्था लड़खड़ा रही थी, आम चुनाव होने में कुछ ही दिन बाकी थे। पूरा राष्ट्र आंतरिक व बाहरी समस्याओं से घिरा हुआ था।
इसके अलावा 1984 का वर्ष अमेरिकी ‘विशिष्टतावाद’ के चरम का वर्ष था। ‘विशिष्टतावाद’ यह अमेरिकी विश्वास था कि अकेला वही है, जिसके पास पूरी दुनिया में सभ्यता या लोकतंत्र स्थापित करने का अधिकार है। रोनाल्ड रीगन राष्ट्रपति थे। उनके नेतृत्व वाले अमेरिकी सैन्य-औद्योगिक गठजोड़ का बोलबाला था और वे शीतयुद्ध में विजय की कगार पर थे। एक देश जो आंतरिक उथल-पुथल की तकलीफ झेल रहा था, वह एक ताकतवर महाशक्ति को कैसे चुनौती दे सकता था। यदि रीगन ने राजीव को फोन किया और उनसे एंडरसन को छोड़ देने के लिए कहा तो ऐसी स्थिति में एंडरसन को छोड़ देना ही उस समय संपूर्ण राष्ट्र के हित में लिया गया सबसे बुद्धिमत्तापूर्ण और दूरदर्शी निर्णय था।
असली घोटाला यह नहीं है कि 7 दिसंबर 1984 को क्या हुआ, जब एंडरसन को देश छोड़कर जाने दिया गया, बल्कि यह है कि उसके बाद के 26 सालों में क्या हुआ? सच्चई यह है कि 1989 में सुप्रीम कोर्ट ने बड़ी खुशी-खुशी भारत सरकार और यूनियन कार्बाइड के बीच तकरीबन एक लाख गैस पीड़ितों के मुआवजे के बतौर 470 मिलियन डॉलर का समझौता कराया। लेकिन सच्चई तो यह है कि प्रभावित लोगों की वास्तविक संख्या कोर्ट द्वारा बताई गई संख्या की पांच गुना थी, लेकिन उन सब लोगों को कभी पूरा मुआवजा नहीं मिला।
1996 में सुप्रीम कोर्ट ने जानते-बूझते भोपाल त्रासदी के अभियुक्तों पर लगे आरोपों पर लीपापोती कर दी और सीबीआई ने उसे कोई चुनौती भी नहीं दी। सच्चई यह है कि पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस अहमदी, जिन्होंने भोपाल मामले में फैसला सुनाया था, उन्हें बाद में भोपाल मेमोरियल ट्रस्ट हॉस्पिटल का प्रमुख बना दिया गया। सच्चई यह है कि न तो अभी तक दुर्घटना की जगह से विषैले कचरे को पूरी तरह साफ किया गया है और न ही आसपास रहने वाले लोगों के लिए पीने के पानी की समुचित व्यवस्था की गई है।
सच्चाई यह भी है कि 1984 के बाद से कांग्रेस और भाजपा, दोनों ने मध्य प्रदेश पर शासन किया। यदि आप भोपाल की जेपी नगर कॉलोनी में घूमें तो स्पष्ट दिखाई देता है कि सरकार ने उन पीड़ितों के लिए कोई गंभीर प्रयास नहीं किया। दो साल पहले जब कुछ पीड़ितों ने प्रधानमंत्री आवास के बाहर धरना दिया तो उन्हें वहां से खदेड़ दिया गया और उन्होंने एक हफ्ता तिहाड़ जेल में गुजारे। एंडरसन को किसने जाने दिया, यह मुख्य मुद्दा नहीं है। मुद्दा यह है: भोपाल त्रासदी पर सरकार की आंखें खुलने में 26 साल क्यों लग गए?
पुनश्च : 1984 में इकलौते कैमरे से लिया गया एंडरसन का वीडियो देखते हुए ख्याल आता है: क्या आज के उन्मादी 24 घंटा चैनलों के दौर में कार्बाइड का बॉस इतनी आसानी से ‘बाय-बाय इंडिया’ करके निकल सकता था।

Monday, June 21, 2010

उनका देश शुरू से स्वार्थी हमारी सरकार हमेशा से कायर

कल्पेश याग्निक

अमेरिका को क्यों कोस रहे हैं? हम अपने भीतर क्यों नहीं झांक रहे? उसने मैक्सिको की खाड़ी में तेल रिसाव पर कठोर कार्रवाई की, हम भोपाल गैस रिसाव पर अमेरिकी चुप्पी से तुलना कर रहे हैं। आखिर क्यॊं? हमारा तर्क है : मैक्सिको रिसाव त्रासदी में 11 लोग मरे हैं। भोपाल गैस रिसाव में 15 हजार लोग मारे गए थे। अमेरिका ने तुरंत 20  बिलियन डॉलर का मुआजा देने के लिए ब्रिटिश पेट्रोलियम को दमनर्पूक मजबूर कर दिया- वहीं भोपाल के गुनहगार यूनियन कार्बाइड के चेयरमैन वारेन एंडरसन के प्रत्यर्पण के लिए वह कभी राजी नहीं हुआ। इसलिए यह सब वाशिंगटन का दोहरा चरित्र उजागर करता है।

किंतु वास्तव में ऐसा नहीं है। यह सब कुछ तो अमेरिकी चरित्र के अनुसार ही हो रहा है। यही नहीं, हमारा तर्क भी तर्क कम, विलाप अधिक है। आइए, देखें, कैसे? अमेरिका है क्या? एक स्वार्थी देश। एक कारोबारी। शुरू से। हमेशा अपना ही फायदा देखनेवाला। उस पर हमला हुआ, तो दो-दो देशों पर हमला कर दिया। और हम पर हमला हो, तो हेडली को सौंपने तक को तैयार नहीं।

..और हमारा भारत क्या है? एक महान, उदारादी देश। किंतु जिसका इतिहास पराजित राजाओं, असफल शासकों और कायर सरकारों का रहा है। देखा जाए तो दोनों अपना-अपना चरित्र ही जी रहे हैं। मैक्सिको की खाड़ी में हुए तेल रिसाव से उनके पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचा तो उन्होंने दोषी कंपनी ब्रिटिश पेट्रोलियम को और ज्यादा नुकसान पहुंचा दिया। लुईजियाना सहित आसपास के चार राज्यों के कारोबार बर्बाद होते देख उन्होंने तुरंत ब्रिटिश पेट्रोलियम को सजा सुनाई : 34 बिलियन डॉलर मांगे। कंपनी नहीं मानी तो राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कंपनी के चेयरमैन कार्ल टेनरिक सनबर्ग और सीईओ टोनी हेवर्ड को सीधे व्हाइट हाउस तलब किया।

पचास अफसरों की मौजूदगी में एक-एक डॉलर का हिसाब लिखाया। 20 बिलियन डॉलर का मुआवजा शुरुआती तौर पर तय किया। इनमें तीन बिलियन तो इसी तिमाही में देने पड़ेंगे। फिर सवा बिलियन हर तीसरे माह। उसे बांटने का जिट्ठमा भी एक फंड को उसी बैठक में दे दिया। जिसकी निगरानी सख्त मिजाज वाले स्वतंत्र वकील कैनेथ फिनबर्ग को सौंपी। फिनबर्ग ने ही 9/11 हमलों के बाद मुआजा बंटवाया था जिसमें एक डॉलर की भी हेराफेरी नहीं होने दी थी।

अब हमारी सरकार की कार्राई पर तुलनात्मक नजर डालिए

हजारों मौतों के बीच जब मानता का गुनहगार, यूनियन कार्बाइड का चेयरमैन भारत पहुंचा तो हमारे विदेश सचिव एम. के. रसगोत्रा ने सबसे पहले उसे सुरक्षित वापसी की गारंटी दी। वे भी भारत सरकार की ओर से। फिर भोपाल में मुख्यमंत्री अर्जुनसिंह ने उसे गिरफ्तार कर लिया। बल्कि गिरफ्तार दिखा दिया। क्योंकि गिरफ्तार आरोपी को कोई उसी के गेस्ट हाउस में आराम करने नहीं भेजता। उधर अमेरिकी दूतावास ने हमारे विदेश सचिव से एंडरसन की रिहाई का आग्रह किया - तो उसे हमारी सरकार ने स्वतः ही दबाव मान लिया। जिस नाटकीय ढंग से गिरफ्तारी - उससे ज्यादा रहस्यमय रिहाई। धारा कमजोर कर दी गई। अफसर विदा करने गए। क्यॊंकि दिल्ली में गृहमंत्री पी.वी. नरसिंह राव ने सुरक्षित वापसी का रसगोत्रा का वादा निभाने की ठान ली। इन सबके बीच प्रधानमंत्री राजीव गांधी एकदम चुप रहे। सुबूत हैं इसके। रसगोत्रा ने साफ कहा है कि राव की बात का राजीव गांधी ने विरॊध नहीं किया था यानी न विरॊध- न समर्थन ।

वैसे ही अर्जुनसिंह ने पत्रकार वार्ता में कहा था : एंडरसन की रिहाई की बात राजीव गांधी को बताई गई थी - और उन्होंने सुन ली थी। एक शक्तिशाली देश की कायर सरकार की ही तो बानगी थी ये सब। फिर मुआवजे पर हमारी सरकार का रुख देखिए। वहां बराक ओबामा ने 20 बिलियन डॉलर को अंतिम आंकड़ा नहीं माना है। जैसे-जैसे जांच होगी, आंकड़ा बढ़ भी सकता है। आपराधिक मुकदमा भी जारी रहेगा। जबकि हमारी सरकार ने यूनियन कार्बाइड से 3.3 बिलियन डॉलर मुआवजे में मांगे थे। पांच साल में ही आधा बिलियन से भी कम (460 मिलियन डॉलर) पर कोर्ट से बाहर समझौता कर लिया। आखिर क्यों? कोई जवाब नहीं। जिस कार्रवाई में अमेरिका को महज 53 दिन लगे हम 26 बरसों में उसकी आधी भी नहीं कर पाएं। जो की वॊ भी कमजोरी भरी। उनके राष्ट्रपति ने कंपनी के बोर्ड को अपने आवास पर तलबकर सबकुछ लिखा लिया, हमारे किसी प्रधानमंत्री ने, किसी मुख्यमंत्री ने तो कभी सपने में भी यूनियन कार्बाइड पर ऐसा कुछ करने का नहीं सोचा।



अब हमारी सरकार पर भास्कर अभियान के तहत भारी दबाव बन गया है कि वह सारे मामले को फिर से जांचे, केस खोले, मुआवजा बढ़ाए और खतरनाक मलबा हटाने के लिए कार्बाइड की मालिक बनी कंपनी डाऊ केमिकल्स को 100 करोड़ खर्च करने जिम्मेदार बनाने पर मजबूर करे। उम्मीद ही की जा सकती है कि कायरता का दाग़ हटाकर, सरकार इस देश की शक्ति के आधार पर कठोर कार्रवाई करेगी।

Tuesday, June 15, 2010

सारा देश भोपाल के साथ, हम किसका मुंह ताक रहे हैं?

धारा बदलेगी : सुप्रीम कोर्ट खुद समीक्षा करे या सरकार
कल्पेश याग्निक, नेशनल एडिटर, दैनिक भास्कर


मुट्ठी भर मठाधीश, पांच लाख निर्दोषों को छल रहे हैं। पूरे २६ बरस से। तब ये बेगुनाह निर्ममता से बर्बाद कर दिए गए। अब निर्लज्जता से प्रताडित किए जा रहे हैं। कानून के नाम पर। किंतु अन्याय की सीमा होती है। न्याय करने वाले हर व्यवस्था में होते ही हैं। दुखद यह है कि उन्हें झकझोरना पड़ता है।

भोपाल गैस त्रासदी मामले में अदालती आदेश के बाद ऐसा करने का समय आ गया है। दो ही विकल्प हैं। या तो सुप्रीम कोर्ट अपने ही स्तर पर १९९६ में जस्टिस ए.एम.अहमदी की कलम से बदलीं, कमजोर कर दी गईं धाराओं की समीक्षा करे। या फिर केंद्र सरकार इस केस को फिर से खुलवाए। दोनों ही बातें संभव हैं। देश हित में हैं। हमें किंतु इसके लिए आक्रामक मुद्रा अपनानी होगी। तंत्र से लड़ाई आसान नहीं होती। किंतु जहरीली गैस की भयावह यादों को सीने में दबाए, इतने बरसों से हर पल, हारी-बीमारी-बेकारी-बेबसी से लड़ ही तो रहे हैं हम। एक और लड़ाई।

अब कुछ पथरीले, खुरदुरे व्यावहारिक सच। जब चारों ओर मौत फैली थी तब लोकतंत्र के तीनों स्तंभों में कहीं गर्जना नहीं उठी कि यूनियन कार्बाइड के दोषी वॉरेन एंडरसन को ऐसे रहस्यमय ढंग से छोड़ क्यों दिया? एक मामूली वाहन चालान बनने पर भी पुलिस डपटती है कि थाने चलो- यहां २५ हजार मौतों के जिम्मेदार की जैसे राजकीय अतिथि सी सेवा की गई। वो भी मुख्यमंत्री के स्तर पर। वो भी प्रधानमंत्री को विश्वास में लेकर। उस दिन की वीडियो क्लिप में यदि आप गौर से देखें तो लग ही नहीं रहा कि अर्जुनसिंह किसी सादे से हादसे का भी मुकाबला करके आए हों।

बड़े ही आत्मविश्वास और प्रभावी शैली में वे पत्रकारों से त्रासदी को लेकर बात कर रहे थे। साथ बैठे राजीव गांधी गंभीर तो दिख रहे हैं लेकिन पूरी तरह अर्जुनसिंह से प्रभावित। जाहिर है उन्होंने ही प्रधानमंत्री को मना लिया होगा। और यदि नहीं- तो वे राष्ट्र के सामने क्यों नहीं लाते कि भोपाल के गुनहगार को क्यों जाने दिया? क्यों? किसी को पता नहीं। क्योंकि किसी ने इन्हें झंझोड़ा नहीं। पक्ष तो होता ही है रीढ़ की हड्डी के बिना। विपक्ष को क्यों सांप सूंघ गया था? और बाद में भी किसने कुछ किया? देखें एक नजर : नरसिंह राव सरकार ने उसे अमेरिका से बुलाने के प्रयास कमजोर कर दिए। अटल सरकार ने  तो एक कदम आगे बढ़कर कार्बाइड के भारतीय प्रमुख केशुब महिंद्रा को पद्म पुरस्कार के लिए चुना।


दूसरी कड़ी हैं नौकरशाह। आज वे टीवी चैनलों पर एक-दूजे को दोषी सिद्ध करने की होड़ में लगे हैं। तब अपने पुंसत्व को ताक में रख गुपचुप उन्हीं आदेशों का पालन करने में लगे थे, जो उनकी आत्मा पर बोझ बन गए होंगे। पीसी अलेक्जेंडर, ब्रह्मस्वरूप, मोतीसिंह और क्या स्वराज पुरी? हर छोटी-बड़ी बात पर नोटशीट पर टीप लिखने के आदी। 'पुनर्विचार करें, समीक्षा करेंÓ लिखकर हर फैसले में अंडग़ा बनने के जन्मजात अधिकारी ये नौकरशाह आज किस मुंह से आरोप-प्रत्यारोप लगा रहे हैं? तीसरी कड़ी है कानून के रखवालों की। चाहे केस तैयार करने वाली पुलिस-सीबीआई हो या फिर लडऩे वाला प्रॉसिक्यूशन हो या कि तत्कालीन न्यायमूर्ति हों। सभी पर प्रश्नचिह्न है। आखिर न्याय के सर्वोच्च ओहदे पर बैठे अहमदी ऐसा कैसे कर सकते हैं?

सीबीआई, केंद्र या राज्य सरकार- कोई तो १९९६ के उस फैसले को चुनौती देता? इन सबसे हटकर बड़ा प्रश्न। सरकार चाहें तो क्या नहीं कर सकतीं। सुप्रीम कोर्ट ने तो अफजल गुरु को फांसी सुना दी है। चार साल हो गए। क्या हुआ? सुप्रीम कोर्ट ने तो शाहबानो को गुजारा भत्ता दिए जाने का फैसला दिया था। सरकार ने एक कानून बनाकर उसे खत्म कर दिया। केरल के मल्लापेरियार बांध से तमिलनाडु पानी लेता था। सुप्रीम कोर्ट ने बांध की ऊंचाई बढ़ाने का फैसला दिया तो केरल ने विधानसभा में कानून बदलकर उस फैसले को निरर्थक कर दिया। इंदिरा गांधी ने किस ताकत के साथ इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को अनदेखा किया था- वह देश को भलीभांति याद है। सब सरकार के हाथ में है। किंतु भोपाल के लाखों पीडि़तों के लिए कोई नेता, अफसर, कानून का रखवाला आगे न आया।


दैनिक भास्कर अतीत के अंधेरे को अपने करोड़ों पाठकों के माध्यम से  मिटाना चाहता है। भोपाल त्रासदी में पहले दिन से भास्कर की कलम सिर्फ पीडितों के पक्ष और सत्ताधीशों की गलत बातों के विपरीत चली है। आज इस अभियान में सांसदों को, सरकार को, सुप्रीम कोर्ट को यदि हम एक पोस्टकार्ड लिखकर, याचिका लगाकर केस पुन: खुलवाने की आवाज उठाएंगे तो मानवता के बड़े अभियान में सहभागी होंगे। पीडितों को सफलता निश्चित मिलेगी। क्योंकि सारा देश उनके साथ है।

हमारे सैकड़ों भोपाल

एंडरसन के पलायन पर जैसी शर्मनाक तू-तू-मैं-मैं हमारे यहां हो रही है, वैसी क्या किसी लोकतंत्र में होती है? अगर भारत की जगह जापान होता तो कई कलंकित नेता या उन मृत नेताओं के रिश्तेदार आत्महत्या कर लेते। हमारे यहां बेशर्मी का बोलबाला है। हमारे नेताओं को दिसंबर के उस पहले सप्ताह में तय करना था कि किसका कष्ट ज्यादा बड़ा है, एंडरसन का या लाखों भोपालियों का?
वेदप्रताप वैदिक, लेखक प्रसिद्ध राजनीतिक चिंतक हैं। 
भोपाल का हादसा हमारे हिंदुस्तान का सच्चा आईना है। भोपाल ने बता दिया है कि हम लोग कैसे हैं, हमारे नेता कैसे हैं, हमारी सरकारें और अदालतें कैसी हैं। कुछ भी नहीं बदला है। ढाई सौ साल पहले हम जैसे थे, आज भी वैसे ही हैं। गुलाम, ढुलमुल और लापरवाह! अब से 264 साल पहले पांडिचेरी के फ्रांसीसी गवर्नर के चंद सिपाहियों ने कर्नाटक नवाब की 10 हजार जवानों की फौज को रौंद डाला। यूरोप के मुकाबले भारत की प्रथम पराजय का यह दौर अब भी जारी है। यूनियन कार्बाइड हो या डाउ केमिकल्स हो या परमाणु हर्जाना हो, हर मौके पर हमारे नेता गोरी चमड़ी के आगे घुटने टेक देते हैं।
आखिर इसका कारण क्या है? हमारी केंद्र और राज्य की सरकारों ने वॉरेन एंडरसन को भगाने में मदद क्यों की? कीटनाशक कारखाने को मनुष्यनाशक क्यों बनने दिया? 20 हजार मृतकों और एक लाख आहतों के लिए सिर्फ 15 हजार और पांच हजार रुपए प्रति व्यक्ति मुआवजा स्वीकार क्यों किया गया? उस कारखाने के नए मालिक डाउ केमिकल्स को शेष जहरीले कचरे को साफ करने के लिए मजबूर क्यों नहीं किया गया? इन सब सवालों का जवाब एक ही है कि भारत अब भी अपनी दिमागी गुलामी से मुक्त नहीं हुआ है।
सबसे पहला सवाल तो यही है कि यूनियन कार्बाइड जैसे कारखाने भारत में लगते ही कैसे हैं? कोई भी तकनीक, कोई भी दवा, कोई भी जीवनशैली पश्चिम में चल पड़ी तो हम उसे आंख मींचकर अपना लेते हैं। हम यह क्यों नहीं सोचते कि यह नई चीज हमारे कितनी अनुकूल है। जिस कारखाने की गैस इतनी जहरीली है कि जिससे हजारों लोग मर जाएं, उससे बने कीटनाशक यदि हमारी फसलों पर छिड़के जाएंगे तो कीड़े-मकोड़े तो तुरंत मरेंगे, लेकिन क्या उससे मनुष्यों के मरने का भी अदृश्य और धीमा इंतजाम नहीं होगा?
इसी प्रकार हमारी सरकारें आजकल परमाणु ऊर्जा के पीछे हाथ धोकर पड़ी हुई हैं। वे किसी भी कीमत पर उसे भारत लाकर उससे बिजली पैदा करना चाहती हैं। बिजली पैदा करने के बाकी सभी तरीके अब बेकार लगने लगे हैं। यह बेहद खर्चीली और खतरनाक तकनीक यदि किसी दिन कुपित हो गई तो एक ही रात में सैकड़ों भोपाल हो जाएंगे। रूस के चेर्नोबिल और न्यूयॉर्क के थ्रीमाइललांग आइलैंड में हुए परमाणु रिसाव तो किसी बड़ी भयावह फिल्म का एक छोटा-सा ट्रेलर भर हैं। यदि हमारी परमाणु भट्टियों में कभी रिसाव हो गया तो पता नहीं कितने शहर और गांव या प्रांत के प्रांत साफ  हो जाएंगे।
इतनी भयावह तकनीकों को भारत लाने के पहले क्या हमारी तैयारी ठीक-ठाक होती है? बिल्कुल नहीं। परमाणु बिजली और जहरीले कीटनाशकों की बात जाने दें, हमारे देश में जितनी मौतें रेल और कारों से होती हैं, दुनिया में कहीं नहीं होतीं। अकेले मुंबई शहर में पिछले पांच साल में रेल दुर्घटनाओं में 20706 लोग मारे गए। भोपाल में तो उस रात सिर्फ  3800 लोग मारे गए थे और 20 हजार का आंकड़ा तो कई वर्षों का है। यदि पूरे देश पर नजर दौड़ाएं तो लगेगा कि भारत में हर साल एक न एक भोपाल होता ही रहता है। इस भोपाल का कारण कोई आसमानी-सुलतानी नहीं है, बल्कि इंसानी है। इंसानी लापरवाही है। इसे रोकने का तगड़ा इंतजाम भारत में कहीं नहीं है। यूनियन कार्बाइड के टैंक 610 और 611 को फूटना ही है, उनमें से गैस रिसेगी ही यह पहले से पता था, फिर भी कोई सावधानी नहीं बरती गई। इस लापरवाही के लिए सिर्फ  यूनियन कार्बाइड ही जिम्मेदार नहीं है, हमारी सरकारें भी पूरी तरह जिम्मेदार हैं। यूनियन कार्बाइड का कारखाना किसी देश का दूतावास नहीं है कि उसे भारत के क्षेत्राधिकार से बाहर मान लिया जाए। भोपाल की मौतों के लिए जितनी जिम्मेदार यूनियन कार्बाइड है, उतनी ही भारत सरकार भी है। जैसे रेल और कार दुर्घटनाओं के कारण इस देश में कोई फांसी पर नहीं लटकता, वैसे ही वॉरेन एंडरसन भी निकल भागता है।
एंडरसन के पलायन पर जैसी शर्मनाक तू-तू-मैं-मैं हमारे यहां हो रही है, वैसी क्या किसी लोकतंत्र में होती है? अगर भारत की जगह जापान होता तो कई कलंकित नेता या उन मृत नेताओं के रिश्तेदार आत्महत्या कर लेते। हमारे यहां बेशर्मी का बोलबाला है। हमारे नेताओं को दिसंबर के उस पहले सप्ताह में तय करना था कि किसका कष्ट ज्यादा बड़ा है, एंडरसन का या लाखों भोपालियों का? उन्होंने अपने पत्ते एंडरसन के पक्ष में डाल दिए? आखिर क्यों? क्या इसलिए नहीं कि भोपाल में मरने वालों के जीवन की कीमत कीड़े-मकोड़े से ज्यादा नहीं थी और एंडरसन गौरांग शक्ति और श्रेष्ठता का प्रतीक था। हमारे भद्रलोक के तार अब भी पश्चिम से जुड़े हैं। दिमागी गुलामी ज्यों की त्यों बरकरार है। यदि एंडरसन गिरफ्तार हो जाता तो उसे फांसी पर चढ़ाया जाता या नहीं, लेकिन यह जरूर होता कि यूनियन कार्बाइड को 15 हजार रुपए प्रति व्यक्ति नहीं, कम से कम 15 लाख रुपए प्रति व्यक्ति मुआवजा देने के लिए मजबूर होना पड़ता। यह मुआवजा भी मामूली ही होता, क्योंकि अभी मैक्सिको की खाड़ी में जो तेल रिसाव चल रहा है, उसके कारण मरने वाले दर्जन भर लोगों को करोड़ों रुपए प्रति व्यक्ति के हिसाब से मुआवजा मिलने वाला है। असली बात यह है कि औसत हिंदुस्तानी की जान बहुत सस्ती है। यही हादसा भोपाल में अगर श्यामला हिल्स और दिल्ली में रायसीना हिल्स के पास हो जाता तो नक्शा ही कुछ दूसरा होता। ये नेताओं के मोहल्ले हैं। भोपाल में वह गरीब-गुरबों का मोहल्ला था। ये लोग बेजुबान और बेअसर हैं। जिंदगी में तो वे जानवरों की तरह गुजर करते हैं, मौत में भी हमने उन्हें जानवर बना दिया है। यही हमारा लोकतंत्र है। हमारी अदालतें काफी ठीक-ठाक हैं, लेकिन जब गरीब और बेजुबान का मामला हो तो उनकी निर्ममता देखने लायक होती है। सामूहिक हत्या को कार दुर्घटना जैसा रूप देने वाली हमारी सबसे बड़ी अदालत को क्या कहा जाए? क्या ये अदालतें हमारे प्रधानमंत्रियों के हत्यारों के प्रति भी वैसी ही लापरवाही दिखा सकती थीं, जैसी कि उन्होंने 20 हजार भोपालियों की हत्या के प्रति दिखाई है? पता नहीं, हमारी सरकारों और अदालतों पर डॉलर का चाबुक कितना चला, लेकिन यह तर्क बिल्कुल बोदा है कि अमेरिकी पंूजी भारत से पलायन न कर जाए, इस डर के मारे ही हमारी सरकारों ने एंडरसन को अपना दामाद बना लिया। पता नहीं, हम क्या करेंगे इस विदेशी पूंजी का? जो विदेशी पंूजी हमारे नागरिकों को कीड़ा-मकोड़ा बनाती हो, उसे हम दूर से ही नमस्कार क्यों नहीं करते? यह ठीक है कि जो मर गए, वे लौटने वाले नहीं और यह भी साफ  है कि जो भुगत रहे हैं, उन्हें कोई राहत मिलने वाली नहीं है, लेकिन चिंता यही है कि हमारी सरकारें और अदालतें अब भी भावी भोपालों और भावी चेर्नोबिलों से सचेत हुई हैं या नहीं? यदि सचेत हुई होतीं तो परमाणु हर्जाने के सवाल पर हमारा ऊंट जीरा क्यों चबा रहा होता?

वारेन एंडरसन और अंकल सैम

जयप्रकाश चौकसे
वारेन एंडरसन के सेवक ने नाश्ते के साथ ताजे अखबार का पुलिंदा उसके सामने रखा। उसने चैन की सांस ली कि भारतीय अदालत ने उसके गुनाह को ट्रक हादसे से अधिक कुछ नहीं माना। आज उसे नाश्ते में ज्यादा मजा आया और वह पूरी प्लेट ही साफ कर गया, परंतु थोड़ी देर बाद ही नब्बे वर्षीय वारेन की अंतडिय़ों में कुलबुलाहट हुई और सेवक की सहायता से वह लडख़ड़ाता हुए टॉयलेट पहुंचा। इस कुलबुलाहट के कारण ही कितने सेवक नौकरी छोड़ गए हैं। विगत पच्चीस वर्षों से वह शौच क्रिया द्वारा रो रहा है। कारपोरेट मोतियाबिंद के कारण उसे आंख से रोना नहीं आता। उसका शरीर मल के साथ ही पच्चीस हजार लोगों के कत्ल के अपराधबोध को बाहर खदेड़ता है। कांपते हाथों से टॉयलेट पेपर पकड़ा नहीं जाता और सेवक फव्वारे से यह काम करता है। हर बार उसे लगता है कि काश चंद डॉलर बचाने के लिए उसने भोपाल कारखाने में फव्वारे लगवाए होते, जो रिसाव हो रही गैस को फैलने से रोकते।
उसे हैरानी है कि अंतडिय़ों से आंसू अब क्यों बह रहे हैं, जबकि न्यायालय ने केवल मजाकिया दंड दिया है। नित्य के समय उसका डॉक्टर अंकल सैम आया, जो इराक और अफगानिस्तान के नरसंहार के बाद पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज बुश का इलाज करता रहा है। उसने हमेशा की तरह लताड़ा कि वारेन तुम मिथ्या अपराधबोध से कब मुक्त होगे। वे पच्चीस हजार तो तुम्हारे हाथों द्वारा कत्ल होने के लिए ही पैदा हुए थे। यंू भी हिंदुस्तान के कौमी दंगों और सड़क दुर्घटनाओं में इतने लोग हर साल मरते हैं। जिस देश में जीने का मोल नहीं तो मरने की कीमत क्या होगी। वारेन तुम सेंटीमेंटल मूर्ख हो। मेरे पास हर बीमारी का इलाज है, मूर्खता का नहीं। उनके 'शोलेÓ का लेखक सलीम कहता है कि पागल का इलाज मुमकिन है, इसीलिए पागलखाने भी हैं, परंतु मूर्खों का इलाज मुमकिन नहीं है। इसलिए किसी भी देश में मूर्खालय नहीं है। वारेन आज तुम्हें खुश होना चाहिए और तुम हो कि बार-बार शौचालय जा रहे हो।
डॉक्टर सैम ने उसका ध्यान बंटाने के लिए कहा कि अच्छा वारेन तुम भोपाल से भागे कैसे? वहां के कुछ मसखरे तत्कालीन मुख्यमंत्री के बदले तत्कालीन प्रधानमंत्री को दोष दे रहे हैं? वारेन ने कहा कि उसके सहायकों ने सबसे गरीब प्रांत मध्यप्रदेश को चुना क्योंकि वहां रिश्वत के भाव मुंबई से कम हैं। वारेन ने कहा कि सबसे ज्यादा डर उसे त्रासदी के कुछ समय बाद लगा, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने न्यूयॉर्क में आयोजित पत्रकार वार्ता में कहा कि पश्चिम के उद्योगपति जब अपने देश में इस तरह के संयंत्र लगाते हैं तो सुरक्षा पर बहुत खर्च करते हैं, परंतु जब गरीब देशों में अपनी ठाठिया मशीनें लगाते हैं तब सुरक्षा पर ध्यान नहीं देते। वह नौजवान बड़ी कड़वी बात बोल गया। परंतु हमारे अनेक सीनेटरों ने उस दिन अपने कानों में वे यंत्र नहीं लगाए थे, जिससे बहरे भी सुन लेते हैं।  डॉक्टर सैम ने दोहराया कि भागे कैसे? वारेन ने कहा कि जो अमेरिकी भारत नहीं गया, वह समझ ही नहीं सकता। सरकार के बेचारे मजबूर आला अफसरों ने अपने हाकिम के हुक्म पर मुझे अपने गाड़ी में एयरपोर्ट छोड़ा और मुख्यमंत्री के विमान से निकल गया। वे हाकिम बड़े तरक्कीपसंद लोग थे। गोरों को खुदा मानते थे और भला कोई अपने खुदा को कठघरे में खड़ा करता है?
वारेन ने कहा कि उन्हें यह बात समझ में नहीं आती कि आज न्यायालय के खिलाफ प्रदर्शन करने वाले युवा तो हादसे के समय पैदा भी नहीं हुए थे। इस समय के नौजवानों और 84 के नौजवानों में बड़ा फर्क है। दरअसल 1984 का भारत बहुत कमजोर था और 2010 का भारत बहुत मजबूत है। डॉक्टर सैम ने कहा कि वारेन तुम मामले की गहराई में नहीं जा रहे हो। विगत दशकों में मल्टीनेशनल की ज्यादतियों से युवा खफा हैं। वारेन तुम सिर्फ बहाना हो। यह आवाज पूरी सड़ांध भरी व्यवस्था के खिलाफ है। युवा यह भी जानते हैं कि महंगाई भी मल्टीनेशनल की वजह से ही बढ़ रही है। चंद डॉलरों के लिए बिकने वाले नेता और अफसरों के खिलाफ है ये प्रतिवाद। वारेन डॉक्टर सैम से प्रार्थना करता है कि सेवक भाग गया है तो वह उसे शौचालय ले जाएं। गुस्साए डॉक्टर सैम ने कहा कि कमबख्त अब तो आंखों से रो ले और अदालत में माफी मांग, ताकि ऊपर की अदालत में कुछ रहम हो। उनकी अवधारणा में तू रौरव नर्क का भागी है- मल के कुंड में पड़ा रहेगा। ज्ञातव्य है कि यूनियन कार्बाइड सिनेमा के प्रोजेक्टर के लिए कार्बन की छड़ें बनाता है और छड़ों के एक पैकेट में वारेन एंडरसन के कागज हाथ लगे। भगवान ही जाने ये कागज सच हैं या झूठ या भारतीय सिनेमा की तरह आधी हकीकत, आधा फसाना।

Monday, June 14, 2010

सोराबजी जवाब दीजिए

2001 में तब के एटार्नी जनरल सोली सोराबजी ने अटल सरकार को राय दी थी कि एंडरसन के प्रत्यर्पण की कोशिश न करें, क्योंकि यह सफल नहीं होगी।  उन्होंने अमेरिकी कानूनी फर्म से राय की सलाह भी दी थी।  2003 में सरकार ने प्रत्यर्पण का आग्रह किया, जिसे ठुकरा दिया गया। जाहिर है काफी वक्त गुजरने से प्रत्यर्पण की कोशिश पर असर पड़ा। भास्कर सोराबजी से सवाल पूछ रहा है। उम्मीद है वे २४ घंटे के भीतर जवाब देंगे। ये सवाल हम उन्हें फैक्स और मेल के जरिये भेज रहे हैं।
1.    जब 98 में एंडरसन के प्रत्यर्पण की कोशिश करने की राय दी थी तो 2001 में इसे बदला क्यों?
2.    अमेरिकी कानूनी फर्म से राय लेने को क्यों कहा जबकि सरकार ने आपसे सलाह मांगी थी?
3.    गैस रिसाव से एंडरसन का सीधा रिश्ता जोडऩे वाले पुख्ता सबूतों को नजरअंदाज क्यों किया?
4.    ऐसा क्यों नहीं कहा कि अमेरिकी फर्म की सलाह के बावजूद सरकार को प्रत्यर्पण की कोशिश करनी चाहिए?
5.    एंडरसन के खिलाफ सबूत मौजूद होने के बाद भी यह क्यों कहा कि प्रत्यर्पण के लिए जरूरी सबूत मिलने की उम्मीद नहीं है?
6.    आपने बाद में कहा कि सरकार सप्लीमेंटरी केस भेजकर अमेरिकी फर्म से गैस पीडि़तों के संतोष के लिए प्रत्यर्पण की प्रक्रिया शुरू करने की राय ले सकती थी। ऐसा राय देते समय क्यों नहीं कहा?
अहमदी से मांगिए जवाब
भास्कर ने अहमदी से १० सवाल पूछे थे। उनकी चुप्पी के बाद हम अहमदी के फोन नंबर व पते छाप रहे हैं। ताकि आप उन पर सच जानने के लिए दबाव बनाएं। फोन : 0129-2511291/९३।  पता : सी-3 कांत एन्क्लेव, शूटिंग रेंज, पोस्ट- अनंतपुर, फरीदाबाद (हरियाणा)।
E-Mail: amahmadi@dataone.in

अहमदी जवाब दीजिए

भोपाल गैस त्रासदी मामले में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश एएम अहमदी ने 1996 में वह बहुचर्चित फैसला सुनाया जिसके तहत अभियोग की धाराएं बदलने से गैर इरादतन हत्या का मामला लापरवाही से हुई दुर्घटना में बदल गया और अनेक प्रश्न खड़े कर दिए।
१    आपके 1996 के जिस फैसले ने गैस त्रासदी मामले में अभियुक्तों की सजा कम करने का रास्ता साफ कर केस को कमजोर किया। उसके बारे में आपका क्या कहना है?
2    सुप्रीम कोर्ट आमतौर पर आरोप तय करने से गुरेज करता है। फिर भी इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के जज के रूप में आपने ऐसा किया। क्यो?
3    आप इससे सहमत हैं कि अगर आरोप ट्रायल कोर्ट में तय होते तो इस मामले में अभियुक्तों को सख्त सजा मिलने का रास्ता खुला रहता?
४    आरोपियों को दो-दो साल की सजा मिली। इसके लिए आप खुद को दोषी मानते हैं? 
5    आपका कहना है कि इस फैसले को लेकर कोई रिव्यू पिटीशन नहीं आई थी। दूसरी तरफ पीडि़तों का आरोप है कि ऐसा कहना सफेद झूठ है। आखिर सच क्या है?
6    आपके फैसले पर उठती उंगलियों के बीच क्या आप कोई समाधान भी सुझाएंगे? 
7    अगर दोबारा फैसला सुनाने का मौका आपको मिले तो क्या निर्णय बदलेगा? 
8    कार्बाइड की भारत स्थित जिस प्रॉपर्टी को पहले राजसात किया गया था बाद में कोर्ट के निर्णय पर उसे फ्री करते हुए उससे मिली राशि से भोपाल गैस अस्पताल बनाया गया। क्या यहां भी कार्बाइड फायदे में नहीं रहा?
9    जिस मामले में सुप्रीम कोर्ट के जज के रूप में आपने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया उसी से जुड़े एक अस्पताल के ट्रस्ट के अध्यक्ष का दायित्व संभालना क्या नैतिक रूप से उचित था?
10    लाभ उठाने के आरोपों के चलते यह निर्णय लेते समय आप किसी द्वंद्व से नहीं गुजरे?

अर्जुन सिंह जवाब दीजिए

एंडरसन को हिफाजत के साथ दिल्ली पहुंचाने का काम क्यों, कैसे और किन परिस्थितियों में हुआ इस सवाल का जवाब भोपाल ही नहीं पूरा देश जानना चाहता है। जिस व्यक्ति के पास सबसे ज्यादा जानकारी है वह हैं तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन ङ्क्षसह। दैनिक भास्कर ने अर्जुन सिंह से दस सवाल इस उम्मीद के साथ पूछे हैं कि वे चौबीस घंटे के भीतर इनके जवाबों के साथ सामने आएंगे।
1.     एंडरसन को छोडऩे का फैसला आपने क्यों किया?
2.     यह निर्णय अगर आपने दबाव में लिया तो वह दबाव किसका था?
3.     क्या तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने इसके लिए आपसे कहा था?
4.     अमेरिका के दबाव का बार-बार जिक्र हुआ है। क्या इस मामले में ऐसे किसी दबाव को आपने भी महसूस किया?
5.     क्या आपको लगता है कि आपका फैसला सही था? देश और पीडि़तों के हित में था? अगर हां, तो क्यों? आधार क्या?
6.     सुब्रह्मण्यम स्वामी का आरोप है कि एंडरसन को छोडऩे के लिए करोड़ों रुपए की डील हुई थी। इसमें कितनी सच्चाई है?
7.     हजारों लोगों की मौत के लिए जिम्मेदार एंडरसन को बाहिफाजत दिल्ली भेजते समय आपके मन में शर्म और अफसोस का भाव था? या कि विवशता थी?
8.     क्या उस समय आपको नहीं लगा कि आप प्रदेश और देश के हितों के खिलाफ एक भयानक फैसला कर चुके हैं?
9.     पूरी ईमानदारी से बताएं क्या आपको ऐसा नहीं लगा कि एंडरसन को भोपाल में रोक कर सजा दिलाने की कोशिश करना आपका नैतिक और राजनीतिक धर्म था?
10. इस बात का अफसोस क्या पिछले 25 सालों से आपका पीछा नहीं करता रहा? क्या आज आप अतीत के गर्भ में दफन उन सारे सवालों के जवाब के साथ सामने आएंगे?  

आइए, आप और हम लड़ें भोपाल के इंसाफ की लड़ाई...

कहीं पढ़ा था कि जब से ये हरे-भरे पेड़ कटकर 'कुर्सी' बने हैं, बगीचे के धर्म ही भूल गए हैं। इन्हें जलती लाशों के सुलगते धुएं में भी सुकून भरी महक आती है। भगत सिंह ने कहा था कि जो ऊंचा सुनते हैं, उन्हें धमाकों की जरूरत होती है। भोपाल को इंसाफ दिलाने के लिए पूरे देश की जनता को एक आवाज में निकृष्ट सरकार, भ्रष्ट नौकरशाहों और ढीली न्यायपालिका की खिलाफत करनी होगी। आइए, आप और हम लड़ें भोपाल के इंसाफ की लड़ाई।

इसे देखकर भी नहीं पसीजे थे वो

ऐसा भयावह दृश्य देखने के बावजूद वॉरेन एंडरसन को वीआईपी ट्रीटमेंट देते हुए भारत से अमेरिका कैसे जाने दिया गया। लगता है कि तत्कालीन सरकार संवेदनशून्य रही होगी।

मातृत्व...

भयानक त्रासदी के बावजूद ममत्व की बानगी।

दु:स्वप्न की मोर्चरी

1984 में भोपाल गैस कांड के बाद मृतकों की शिनाख्ती के लिए इस तरह से दीवारों पर चस्पा की गईं थीं फोटोज।

मैंने वक्त को बदलते देखा है...

25 साल से न्याय का इंतजार करती नजरों को अब धुंधला दिखने लगा है, मगर आरोपी एंडरसन का चेहरा आज भी नहीं भूली।

मौत के बाद भी 'फटी' रह गईं आंखें


जागो मन'मोहन प्यारे...