जयप्रकाश चौकसे
वारेन एंडरसन के सेवक ने नाश्ते के साथ ताजे अखबार का पुलिंदा उसके सामने रखा। उसने चैन की सांस ली कि भारतीय अदालत ने उसके गुनाह को ट्रक हादसे से अधिक कुछ नहीं माना। आज उसे नाश्ते में ज्यादा मजा आया और वह पूरी प्लेट ही साफ कर गया, परंतु थोड़ी देर बाद ही नब्बे वर्षीय वारेन की अंतडिय़ों में कुलबुलाहट हुई और सेवक की सहायता से वह लडख़ड़ाता हुए टॉयलेट पहुंचा। इस कुलबुलाहट के कारण ही कितने सेवक नौकरी छोड़ गए हैं। विगत पच्चीस वर्षों से वह शौच क्रिया द्वारा रो रहा है। कारपोरेट मोतियाबिंद के कारण उसे आंख से रोना नहीं आता। उसका शरीर मल के साथ ही पच्चीस हजार लोगों के कत्ल के अपराधबोध को बाहर खदेड़ता है। कांपते हाथों से टॉयलेट पेपर पकड़ा नहीं जाता और सेवक फव्वारे से यह काम करता है। हर बार उसे लगता है कि काश चंद डॉलर बचाने के लिए उसने भोपाल कारखाने में फव्वारे लगवाए होते, जो रिसाव हो रही गैस को फैलने से रोकते। उसे हैरानी है कि अंतडिय़ों से आंसू अब क्यों बह रहे हैं, जबकि न्यायालय ने केवल मजाकिया दंड दिया है। नित्य के समय उसका डॉक्टर अंकल सैम आया, जो इराक और अफगानिस्तान के नरसंहार के बाद पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज बुश का इलाज करता रहा है। उसने हमेशा की तरह लताड़ा कि वारेन तुम मिथ्या अपराधबोध से कब मुक्त होगे। वे पच्चीस हजार तो तुम्हारे हाथों द्वारा कत्ल होने के लिए ही पैदा हुए थे। यंू भी हिंदुस्तान के कौमी दंगों और सड़क दुर्घटनाओं में इतने लोग हर साल मरते हैं। जिस देश में जीने का मोल नहीं तो मरने की कीमत क्या होगी। वारेन तुम सेंटीमेंटल मूर्ख हो। मेरे पास हर बीमारी का इलाज है, मूर्खता का नहीं। उनके 'शोलेÓ का लेखक सलीम कहता है कि पागल का इलाज मुमकिन है, इसीलिए पागलखाने भी हैं, परंतु मूर्खों का इलाज मुमकिन नहीं है। इसलिए किसी भी देश में मूर्खालय नहीं है। वारेन आज तुम्हें खुश होना चाहिए और तुम हो कि बार-बार शौचालय जा रहे हो।
डॉक्टर सैम ने उसका ध्यान बंटाने के लिए कहा कि अच्छा वारेन तुम भोपाल से भागे कैसे? वहां के कुछ मसखरे तत्कालीन मुख्यमंत्री के बदले तत्कालीन प्रधानमंत्री को दोष दे रहे हैं? वारेन ने कहा कि उसके सहायकों ने सबसे गरीब प्रांत मध्यप्रदेश को चुना क्योंकि वहां रिश्वत के भाव मुंबई से कम हैं। वारेन ने कहा कि सबसे ज्यादा डर उसे त्रासदी के कुछ समय बाद लगा, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने न्यूयॉर्क में आयोजित पत्रकार वार्ता में कहा कि पश्चिम के उद्योगपति जब अपने देश में इस तरह के संयंत्र लगाते हैं तो सुरक्षा पर बहुत खर्च करते हैं, परंतु जब गरीब देशों में अपनी ठाठिया मशीनें लगाते हैं तब सुरक्षा पर ध्यान नहीं देते। वह नौजवान बड़ी कड़वी बात बोल गया। परंतु हमारे अनेक सीनेटरों ने उस दिन अपने कानों में वे यंत्र नहीं लगाए थे, जिससे बहरे भी सुन लेते हैं। डॉक्टर सैम ने दोहराया कि भागे कैसे? वारेन ने कहा कि जो अमेरिकी भारत नहीं गया, वह समझ ही नहीं सकता। सरकार के बेचारे मजबूर आला अफसरों ने अपने हाकिम के हुक्म पर मुझे अपने गाड़ी में एयरपोर्ट छोड़ा और मुख्यमंत्री के विमान से निकल गया। वे हाकिम बड़े तरक्कीपसंद लोग थे। गोरों को खुदा मानते थे और भला कोई अपने खुदा को कठघरे में खड़ा करता है?
वारेन ने कहा कि उन्हें यह बात समझ में नहीं आती कि आज न्यायालय के खिलाफ प्रदर्शन करने वाले युवा तो हादसे के समय पैदा भी नहीं हुए थे। इस समय के नौजवानों और 84 के नौजवानों में बड़ा फर्क है। दरअसल 1984 का भारत बहुत कमजोर था और 2010 का भारत बहुत मजबूत है। डॉक्टर सैम ने कहा कि वारेन तुम मामले की गहराई में नहीं जा रहे हो। विगत दशकों में मल्टीनेशनल की ज्यादतियों से युवा खफा हैं। वारेन तुम सिर्फ बहाना हो। यह आवाज पूरी सड़ांध भरी व्यवस्था के खिलाफ है। युवा यह भी जानते हैं कि महंगाई भी मल्टीनेशनल की वजह से ही बढ़ रही है। चंद डॉलरों के लिए बिकने वाले नेता और अफसरों के खिलाफ है ये प्रतिवाद। वारेन डॉक्टर सैम से प्रार्थना करता है कि सेवक भाग गया है तो वह उसे शौचालय ले जाएं। गुस्साए डॉक्टर सैम ने कहा कि कमबख्त अब तो आंखों से रो ले और अदालत में माफी मांग, ताकि ऊपर की अदालत में कुछ रहम हो। उनकी अवधारणा में तू रौरव नर्क का भागी है- मल के कुंड में पड़ा रहेगा। ज्ञातव्य है कि यूनियन कार्बाइड सिनेमा के प्रोजेक्टर के लिए कार्बन की छड़ें बनाता है और छड़ों के एक पैकेट में वारेन एंडरसन के कागज हाथ लगे। भगवान ही जाने ये कागज सच हैं या झूठ या भारतीय सिनेमा की तरह आधी हकीकत, आधा फसाना।
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