Tuesday, June 15, 2010

सारा देश भोपाल के साथ, हम किसका मुंह ताक रहे हैं?

धारा बदलेगी : सुप्रीम कोर्ट खुद समीक्षा करे या सरकार
कल्पेश याग्निक, नेशनल एडिटर, दैनिक भास्कर


मुट्ठी भर मठाधीश, पांच लाख निर्दोषों को छल रहे हैं। पूरे २६ बरस से। तब ये बेगुनाह निर्ममता से बर्बाद कर दिए गए। अब निर्लज्जता से प्रताडित किए जा रहे हैं। कानून के नाम पर। किंतु अन्याय की सीमा होती है। न्याय करने वाले हर व्यवस्था में होते ही हैं। दुखद यह है कि उन्हें झकझोरना पड़ता है।

भोपाल गैस त्रासदी मामले में अदालती आदेश के बाद ऐसा करने का समय आ गया है। दो ही विकल्प हैं। या तो सुप्रीम कोर्ट अपने ही स्तर पर १९९६ में जस्टिस ए.एम.अहमदी की कलम से बदलीं, कमजोर कर दी गईं धाराओं की समीक्षा करे। या फिर केंद्र सरकार इस केस को फिर से खुलवाए। दोनों ही बातें संभव हैं। देश हित में हैं। हमें किंतु इसके लिए आक्रामक मुद्रा अपनानी होगी। तंत्र से लड़ाई आसान नहीं होती। किंतु जहरीली गैस की भयावह यादों को सीने में दबाए, इतने बरसों से हर पल, हारी-बीमारी-बेकारी-बेबसी से लड़ ही तो रहे हैं हम। एक और लड़ाई।

अब कुछ पथरीले, खुरदुरे व्यावहारिक सच। जब चारों ओर मौत फैली थी तब लोकतंत्र के तीनों स्तंभों में कहीं गर्जना नहीं उठी कि यूनियन कार्बाइड के दोषी वॉरेन एंडरसन को ऐसे रहस्यमय ढंग से छोड़ क्यों दिया? एक मामूली वाहन चालान बनने पर भी पुलिस डपटती है कि थाने चलो- यहां २५ हजार मौतों के जिम्मेदार की जैसे राजकीय अतिथि सी सेवा की गई। वो भी मुख्यमंत्री के स्तर पर। वो भी प्रधानमंत्री को विश्वास में लेकर। उस दिन की वीडियो क्लिप में यदि आप गौर से देखें तो लग ही नहीं रहा कि अर्जुनसिंह किसी सादे से हादसे का भी मुकाबला करके आए हों।

बड़े ही आत्मविश्वास और प्रभावी शैली में वे पत्रकारों से त्रासदी को लेकर बात कर रहे थे। साथ बैठे राजीव गांधी गंभीर तो दिख रहे हैं लेकिन पूरी तरह अर्जुनसिंह से प्रभावित। जाहिर है उन्होंने ही प्रधानमंत्री को मना लिया होगा। और यदि नहीं- तो वे राष्ट्र के सामने क्यों नहीं लाते कि भोपाल के गुनहगार को क्यों जाने दिया? क्यों? किसी को पता नहीं। क्योंकि किसी ने इन्हें झंझोड़ा नहीं। पक्ष तो होता ही है रीढ़ की हड्डी के बिना। विपक्ष को क्यों सांप सूंघ गया था? और बाद में भी किसने कुछ किया? देखें एक नजर : नरसिंह राव सरकार ने उसे अमेरिका से बुलाने के प्रयास कमजोर कर दिए। अटल सरकार ने  तो एक कदम आगे बढ़कर कार्बाइड के भारतीय प्रमुख केशुब महिंद्रा को पद्म पुरस्कार के लिए चुना।


दूसरी कड़ी हैं नौकरशाह। आज वे टीवी चैनलों पर एक-दूजे को दोषी सिद्ध करने की होड़ में लगे हैं। तब अपने पुंसत्व को ताक में रख गुपचुप उन्हीं आदेशों का पालन करने में लगे थे, जो उनकी आत्मा पर बोझ बन गए होंगे। पीसी अलेक्जेंडर, ब्रह्मस्वरूप, मोतीसिंह और क्या स्वराज पुरी? हर छोटी-बड़ी बात पर नोटशीट पर टीप लिखने के आदी। 'पुनर्विचार करें, समीक्षा करेंÓ लिखकर हर फैसले में अंडग़ा बनने के जन्मजात अधिकारी ये नौकरशाह आज किस मुंह से आरोप-प्रत्यारोप लगा रहे हैं? तीसरी कड़ी है कानून के रखवालों की। चाहे केस तैयार करने वाली पुलिस-सीबीआई हो या फिर लडऩे वाला प्रॉसिक्यूशन हो या कि तत्कालीन न्यायमूर्ति हों। सभी पर प्रश्नचिह्न है। आखिर न्याय के सर्वोच्च ओहदे पर बैठे अहमदी ऐसा कैसे कर सकते हैं?

सीबीआई, केंद्र या राज्य सरकार- कोई तो १९९६ के उस फैसले को चुनौती देता? इन सबसे हटकर बड़ा प्रश्न। सरकार चाहें तो क्या नहीं कर सकतीं। सुप्रीम कोर्ट ने तो अफजल गुरु को फांसी सुना दी है। चार साल हो गए। क्या हुआ? सुप्रीम कोर्ट ने तो शाहबानो को गुजारा भत्ता दिए जाने का फैसला दिया था। सरकार ने एक कानून बनाकर उसे खत्म कर दिया। केरल के मल्लापेरियार बांध से तमिलनाडु पानी लेता था। सुप्रीम कोर्ट ने बांध की ऊंचाई बढ़ाने का फैसला दिया तो केरल ने विधानसभा में कानून बदलकर उस फैसले को निरर्थक कर दिया। इंदिरा गांधी ने किस ताकत के साथ इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को अनदेखा किया था- वह देश को भलीभांति याद है। सब सरकार के हाथ में है। किंतु भोपाल के लाखों पीडि़तों के लिए कोई नेता, अफसर, कानून का रखवाला आगे न आया।


दैनिक भास्कर अतीत के अंधेरे को अपने करोड़ों पाठकों के माध्यम से  मिटाना चाहता है। भोपाल त्रासदी में पहले दिन से भास्कर की कलम सिर्फ पीडितों के पक्ष और सत्ताधीशों की गलत बातों के विपरीत चली है। आज इस अभियान में सांसदों को, सरकार को, सुप्रीम कोर्ट को यदि हम एक पोस्टकार्ड लिखकर, याचिका लगाकर केस पुन: खुलवाने की आवाज उठाएंगे तो मानवता के बड़े अभियान में सहभागी होंगे। पीडितों को सफलता निश्चित मिलेगी। क्योंकि सारा देश उनके साथ है।

6 comments:

नीलिमा सुखीजा अरोड़ा said...

वाकई ये शक्तिशाली लोगों के सामने देश और लोगों की हार है

umesh singh said...

शानदार। काश आपके के ये शब्द बाण सटीक निशानें पर जाकर लगे तो कुछ बात बनें।

shrawan singh rathore said...

संवेदनाएं जब सवाल खडा करती है तॊ जरूरत जवाब की हॊती है। और हमारे राजनेता जवाब देना भूल गए हैं। दरअसल वे सिर्फ श्वासन देती हैॊ ऐसे इसलिए क्यॊंकि उनकी आत्माएं मर चुकी है। उनकी आत्मा कॊ जगाने के लिए जरूरी है सवाल खडे करना। आपने भॊपाल गैस त्रासदी कॊ लेकर जॊ अभियान शुरू किया है वॊ बताता है कि वाकई पत्रकारिता चौथा स्तंभ है। देश कॊ ऐसे ही जज्बे की जरूरत है।

shrawan singh rathore

mohi sharma said...

yah andha kanoon hai.

renu said...

nice.

अनुज खरे said...

शब्दों के ऐसे ही प्रहार कुछ कर पाएंगे। अन्यथा तो बरसों से हुक्मरान पीड़ितों को धोखा देते आ रहे हैं।

उस हत्यारी रात में हजारों सपनों की मौत हुई थी। लाखों उम्मीदें दफन हुई थीं। कुछ एकड़ में फैला मौत का प्लांट आज भी इस पीढ़ी की आंखों में खून उतार देता है। विधवाओं, अनाथों को देखकर उनकी मुट्ठियां भिंच जाती हैं। बद्दुआएं देते-देते जबान सूख चली है। अपनों को खोने के गम से ज्यादा हत्यारे को सजा न दिला पाने का दुख उन्हें सालता है। बरसों से इस त्रासदी का जिम्मेदार अपराधी एंडरसन विदेश में देश के कानून की पकड़ से दूर है।
केवल इसलिए कि उनके अपनों ने उन्हें धोखा दिया है। अब सिर्फ मीडिया पर ही भरोसा है अन्यथा तो सियासत अपना काम कर चुकी है।