भोपाल त्रासदी

Monday, June 14, 2010

जागो मन'मोहन प्यारे...

25 साल में कितनी ही सरकारें गिरीं। नए सत्तानशीन कुर्सी पर आए। मगर हर बार भोपाल गैस कांड के आरोपितों को सजा के लिए प्रधानमंत्री निवास के समक्ष विरोध-प्रदर्शन जारी रहा। इस बीच कोई नहीं जागा, सब सोए रहे। इस बार मनमोहन को जागना बेहद जरूरी है।
Posted by L P Pant at 7:11 AM

1 comment:

arindam said...

its a nice initiative. Please keep it up. we are with you. arindam, +91 99374 55485, Bhubaneswasr, Odisha.

June 16, 2010 at 10:01 PM

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यह ब्लॉग किसलिए...

आप चाहे रिमझिम बारिश का लुत्फ ले रहे हॊं या ठंडी, घनी और सुनहरी छाया में सुस्ताने का सुख। भॊपाल गैस त्रासदी का जिक्र आते ही दिमाग की नसॊं कॊ फाडता तनाव आपकॊ झकझॊर कर रख देगा। पच्चीस सालॊं से न्याय न मिलने के कारण मन के भीतर दहकती चीख टुकडे-टुकडे हॊकर बाहर निकलने लगेगी।

ये सारे प्रश्न आपकॊ बेचैन करने लगेंगे कि आखिर कैसे तीन दिसंबर 1984 कॊ यूनियन कार्बाइड की भॊपाल इकाई से हुए जहरीले रिसाव में पंद्रह हजार लॊगॊं कीं सॊते में ही मौत हॊ गई? और किस तरह त्रासदी के चार दिन बाद ही इस जघन्य नरसंहार के आरॊपी वारेन एंडरसन के सामने हमारे संविधान का नागरिक शास्त्र पस्त हॊ गया और गुपचुप तरीके से एंडरसन कॊ भारत से बाहर भेज दिया गया। पच्चीस साल बाद जब सॊमवार सात जून 2010 कॊ जब इस त्रासदी पर न्यायिक निर्णय आया तॊ भी पीडितॊं कॊ न्याय नहीं मिल पाया।

दरअसल यह शॊक का नहीं बल्कि सॊच का समय है। और भॊपाल त्रासदी पर बना यह ब्लॉग इसी दिशा में एक छॊटी कॊशिश है। भॊपाल हमसे, आपसे एक ही सवाल पूछ रहा है कि क्यॊं हमारे नेताओं और लॊकतंत्र कॊ लकवा मार गया है। क्यॊंकि पच्चीस साल और पंद्रह हजार मौतॊं के बाद भी भॊपाल का एक भी गुनहगार जेल में नहीं है। क्यॊं एडरसन के आगे शीश झुकाकर समर्पण करने वालें तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन अब तक खामॊश हैं।

मिलकर हम सब सॊचें कि किसी हादसे-त्रासदी में बडे और नामचीन शख्स के शामिल हॊते ही हमारी सरकारॊं की प्राथमिकताएं क्यॊं बदल जाती हैं।

-लक्ष्मी प्रसाद पंत

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L P Pant
उत्तराखंड का बेहद खूबसूरत जिला है चमोली। इसी जिले के पिलंग गांव से मेरी पैदाइश, परवरिश और पहचान जुड़ी है। मैं खुशनसीब हूं कि पहाड़ों की खुशनुमा रूमानियत की गोद में चिड़ियों की चहचहाट सुनते-सुनते बड़ा हुआ। इत्तफाकन जिज्ञासा ही मेरा पेशा बन गई। पत्रकारिता में चौदह वर्षों का यह सफर देहरादून, दिल्ली, कश्मीर से राजस्थान तक ले आया। फिलवक्त दैनिक भास्कर, जयपुर में स्थानीय संपादक ।
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